Sunday, 26 June 2016

महाराणा प्रताप

महाराणा प्रताप
महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में शिशोदिया राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलो को कही बार युद्ध में भी हराया।
जन्म: 9 मई 1540, कुम्भलगढ़
मृत्यु: 29 जनवरी 1597, चावंड उदयपुर
जीवनसाथी: अजबदे पंवार (विवा. 1557–1597), अधिक
बच्चे: अमर सिंह, कुँवर दुर्जन सिंह, शेख सिंह, अधिक
अभिभावक: राणा उदय सिंह द्वितीय, महारानी जैवन्ताबाई
भाई-बहन: जगमाल सिंह, मीर शक्ति सिंह, कुँवर विक्रमदेव, चन्द कँवर, मान कँवर,सागर सिंह
हल्दी घाटी की माटी तो चन्दन है कुछ और नहीं !
भारतवासी तिलक लगाकर गौरव से भर जाते है ,
परदेसी भी नहीं घूमने तीरथ करने आते है !''
 1. हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था. अकबर और राणा के बीच यह युद्ध महाभारत युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ था. 
2. ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी.
3. महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था. 
4. आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे.
5. कहते हैं कि अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 6 शान्ति दूतों को भेजा था, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह कहते हुए हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि राजपूत योद्धा यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता.
6. महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थीं. कहा जाता है कि उन्होंने ये सभी शादियां राजनैतिक कारणों से की थीं.
7. महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था.
8. महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह ही उनका घोड़ा चेतक भी काफी बहादुर था.
9.  बताया जाता है जब युद्ध के दौरान मुगल सेना उनके पीछे पड़ी थी तो चेतक ने महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को पार किया था.आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है.
10. हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लडने वाले सिर्फ एक मुस्लिम सरदार था -हकीम खां सूरी. 
हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था. अकबर और राणा के बीच यह युद्ध महाभारत युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ था. ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुग़लों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से सन्धि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाई लड़ते रहे. अकबर के सेनापति का नाम मानसिह था.

Tuesday, 12 January 2016

रिस्तो के प्रकार

मुठ
तलवार दो हिस्सों से मिलकर बनती है, पहला मुठ और दूसरा तलवार वो म्यान के अंदर रहती हैं, मुठ का भाग हमेशा खुला रहता है. मुठ विभिन्न प्रकार से सोना, चांदी, हीरे, जवाहरत से जुडी [ सजाई ] रहती है. मुठ के बिना तलवार नहीं बन सकती और तलवार के बिना मुठ किसी काम की नहीं, तलवार अपने आप में तेज धार युक्त उत्तम लोहे की होती वो लोहा जो जंग नहीं पकड़ता हो जल्दी, मुठ और तलवार को जकड़ कर रखने में लाख का महत्व होता है जितनी गुणवता पूर्ण लाख होती उतनी टिकाऊ दोनों का जोड़ होगा. इस बात से हमारे रिस्तो की पकड़ को मेरे दादाजी श्री मान पदम सिंह जी राणावत मुझे बचपन में सिखाते की
रिस्तो के प्रकार
जिस तरह एक मजबूत तेजस्विनी धार युक्त तलवार में जो गुण होने चाहिए वो गुण सामाजिक स्तर पर एक "जाती" का होता हैं, मुठ एक प्रकार से एक किनारा ठाकुर साहब होते है, और दूसरा किनारा तलवार का वो हिस्सा होता वो भाई बन्धु जिससे समाज बनता है. लाख का वो स्थान होता जो देव स्थान से जाना जाता सकता हैं, उस देवता के आराध्य से एक जुड़े होने का हमे बनाये रखता है. म्यान हमारी क्षत्राणीया होती है जो हमारी रक्षा करती हैं. मुठ के म्यान नहीं होती यानि औरतो का प्रितिबंध नहीं होता जहा चाहे जितनी चाहे शादिया कर सकते में समर्थ होते हैं.

एक जमाने में इस गोड्वाड क्षेत्र में मीणा जाती का आतंक रहा था, "बालिया चौहान" का बाहुल बड़ा कमजोर था जब की उनका शासन काल था.

एकलिंगनाथ जी की कृपा से इस प्रकार से गोड वाड में राणावत परिवार ने  "बालिया चौहान" का    आधिपत्य जीता और अपना शासनकाल उदय किया और वर्तमान काल में शासित हो रहा है.

Thursday, 18 September 2014

हिंदुआ सूरज

रिश्तो के प्रकार
        समाज में समाजवादी मनुष्य प्राय पाया जाता हैं. जिसमें रिश्तो के आधारित रिश्तेदार बनाया जाता हैं. जिस तरह से हिरा सोने में गढा जाता हैं. सोना कैसा होता उसकी परख एक सुनार ही करता वैसे रत्न [ हिरा-पन्ना, मोती-माणक इत्यादिक ] एक जौहरी ही परखता हैं.

       ठीक रत्न और सोना का सत्यापन के बाद ही इनको जड़ा जाता हैं. जिस तरह सोना भी पहनने का सवाल होता की शरीर के किस भाग में पहनना या धारण करना के अनुसार ही बनाया जाता हैं. वैसे ही रिस्तो का राजपूत में  देखा जाता की हमारे लायक अनुसार हैं.

      क्षत्रिय रजोगुण युक्त आहार से अपना शरीर से राज्य तभी भोगता जिस तरह वन में शेर बिना राज्याभिषेक के राज्य करता हैं.

       भौतिक सत्यापन में शेर स्वरूप कीर्तिमान, चिताकर्षण, बल-बुद्धि, स्फूर्ति, जोश-जूनून, उमंग-उत्साह, हर्ष के उपयोग युक्त, युक्ति पुरुष का पुरषार्थ करनेवाले राणा-राजा, महाराणा-महाराजा, राव-उमराव, ठाकुर-मुखिया के नेतृत्व में राज्य, प्रदेश या नगर-गाँव पर शासन से प्रजा का सन्माननीय जीवन होता रजोगुण भोगता के समक्ष जातीय सम्बन्ध का विवाह से रिस्तों मेल-मिलाप होता हैं,

       समय के अनुसार रिश्तो  में परिवर्तन अनुसन्धानो के मध्य बनता बिगड़ता आया जिसको सामाजिक गतिशीलता कहा जाता हैं, रिस्तो में वर्धमान-हास्मान होता आया हैं, फिर भी स्थिर बुद्धिमान व्यक्ति परम्परागत रिवाजो के मूल्यों को बनाये रखने में कठिनाई भरा जीवन जीने में साहस रखा कर संघर्ष से जिया उनका रिश्ता कभी खराव नहीं हुआ वो पृष्टभूमि के क्षत्रिय पृष्टभूमि का गौरव मात्र मेवाड़ ही रहा हैं. और उसका भाईपा राणावत परिवार. 

Tuesday, 25 February 2014

वक्त

समय चक्र रुकता नहीं, समय परिवर्तनशील, आज समय के अनुसार रीती रिवाजों में संशोधन को मान्यता देता मोटा गुडा ठिकाना के सिरदार आधुनिक में वैदिक संस्कार संभाले प्रग्रति के राह में आधुनिक शिक्षा से सम्पन्नता लिए बढ़ रहा हैं.   

Wednesday, 10 July 2013

राणावत

श्री मान रघुनाथ सिंह जी राणावत निवासी ठिकाना सेणा राणावत, बाली पाली राजस्थान नें रिटायर्ड अमिन इन्होनें करीब करीब राजस्थान में सभी जगह पर 1952 सेटलमेंट विभाग में नौकरी के समय भूमि नापने का काम किया.

Saturday, 13 April 2013

समयनुसार

ठिकाना - बेडा और नाना राणावत भाईपा के विधायक 
बाली विधानसभा के विधायक
वर्ष चुने गये विधायक का नाम पार्टी संबद्धता
1.  1951 श्री मान लक्ष्मण सिंह राणावत ठिकाना बेडा ठाकुर साहब निर्दलीय
2.  1977 श्री मान हनवंत सिंह राणावत ठिकाना छोटा गुडा ठाकुर साहब के छोटे और तीसरे नंबर के भाई पादरला पंचायत जनता पार्टी
3.  2003 श्री मान पुष्पेन्द्र सिंह राणावत ठिकाना बीजापुर के ठाकुर साहब भारतीय जनता पार्टी
4. 2008 श्री मान पुष्पेन्द्र सिंह राणावत ठिकाना बीजापुर के ठाकुर साहब भारतीय जनता पार्टी
5. वर्तमान दावेदार श्री मान पुष्पेन्द्र सिंह राणावत ठिकाना बीजापुर के ठाकुर साहब भारतीय जनता पार्टी .

Monday, 8 April 2013

गुडा गुमान सिंह

गुडा गुमान सिंह = सन १९५२ में जमीदारी का सेटलमेंट था उस दौरान , मोटा गुडा, बड़ा गुडा और छोटा गुडा के नामो की नवीनता के मध्यता से आप सी दोनों गाँवो के साथ बीजापुर ठाकुर साहब श्री देवी सिंह जी के साथ सेणा गाँव के युवा अमिन श्री रघुनाथ सिंह जी राणावत के दिशा निर्देशन से तय हुआ की इन गाँवो को आधुनिकीकरण के अनुसार गुडा गुमान सिंह और गुडा देवी सिंह के नाम से राजकीय कामो में उपयोग लिया जाया जाय का निर्णय हुआ. जो अभी तक शिक्षित वर्गी ही इन नामो का उच्चारण का काम लेते हैं ,फिर भी क्षेत्रीय भाषाओं में आज भी गुडा गुमान सिंह गाँव को मोटा गुडा और बड़ा गुडा एवं गुडा देवी सिंह गाँव को छोटा गुडा के नामो से पुकारा जाता है .

Wednesday, 20 February 2013

भूख लगे तो खाना प्रकृति हैं, भूख नही लगें, तो खाना विकृति हैं. और स्वयं भूखें रहकर किसी भूखें को खिलाना संस्कृति हैं .इस को भारत कहते हैं............................................................................................................... .Nature hungry eat, hunger not start to eat pathology. Staying hungry hungry to feed themselves and culture. This is India.

समय मिलने पर

दाता हुकम फुरमाया करते अपने पोतो यानि मेरे पिताजी श्रीमान अभय सिंह जी को, की कीमत तलवार की नही होती ,कीमत होती कमर की .उनके कहने का मतलब होता की जो तलवार चलाना नही जानता उस को एक दम नई धारदार तलवार दे दि जाये और एक राजपूत को भोंटी धार हिन् तलवार दे दि जाये तो राजपूत उस तलवार को चला सकता हैं  

Monday, 18 February 2013

आराधना सभी को करनी चाहिए 

Sunday, 17 February 2013

शिशोदिया वंश की साखा


क्षत्रिय और शिकार

दाता हुकम ठाकुर साहब फुर्माते [ कहते, बताते थें ] थें. की  क्षत्रिय = क्षत्त का अर्थ होता हैं चोट खाया हुआ. जो क्षति से रक्षा करे वह क्षत्रिय कहलाता हैं. [ त्रायते - रक्षा प्रदान करना  ] क्षत्रियो को वन मे आखेट करने का प्रशिक्षण दिया जाता हैं. क्षत्रिय जंगल में जाकर शेर से ललकार कर मुकाबला करता है और आमने सामने बिची, कटारी और तलवार से मुलाबला करता है, और शेर की मृत्यु होने के बाद उस की राजसी ढंग से उस की अंतिम संस्कार करते है .क्यों की शेर को ललकारने और मारने की शिक्षा दि जाती क्योकि कभी कभी धर्मिक हिंसा भी अन्यवारी भी होती जिस के पीछे कारण होता की समाज की रक्षा सफलता पूर्वक की जा सके इस लिए क्षत्रियो को सीधे सन्यास आश्रम ग्रहण करने की कोई विधि या विधान नही हैं,

क्षत्रिय और शिकार

 क्षत्रिय और शिकार -  दाता हुकम ठाकुर साहब फुर्माते [ कहते, बताते थें ] थें. की  क्षत्रिय = क्षत्त का अर्थ होता हैं चोट खाया हुआ. जो क्षति से रक्षा करे वह क्षत्रिय कहलाता हैं. [ त्रायते - रक्षा प्रदान करना  ] क्षत्रियो को वन मे आखेट करने का प्रशिक्षण दिया जाता हैं. क्षत्रिय जंगल में जाकर शेर से ललकार कर मुकाबला करता है और आमने सामने बिची, कटारी और तलवार से मुलाबला करता है, और शेर की मृत्यु होने के बाद उस की राजसी ढंग से उस की अंतिम संस्कार करते है. क्यों की शेर को ललकारने और मारने की शिक्षा दि जाती क्योकि कभी कभी धर्मिक हिंसा भी अन्यवारी भी होती जिस के पीछे कारण होता की समाज की रक्षा सफलता पूर्वक की जा सके इस लिए क्षत्रियो को सीधे सन्यास आश्रम ग्रहण करने की कोई विधि या विधान नही हैं,

Saturday, 9 February 2013

मोटा गुडा के रिश्तेदार

जय श्री कृष्ण =  श्री मति राणावत जी धर्म पत्नी ठाकुर साहब प्रताप सिंह जी शेखावत ठिकाना राणावतो की चोगावाडी का स्वर्गवास, 1 फरवरी २०१३ को हुआ. ठाकुर साहब प्रताप सिंह जी मूल बनेडा ठिकाने के रहने वाले थे, ठाकुर साहब का ननियाल चोगावाडी था, आप नानोसा के आज्ञा से सुखवासी निवासी चोगावडी बिराजमान हुए .  
2. श्री मान जेलर साहब पाबू सिंह जी का  स्वर्गवास 3 फरवरी २०१३ को हुआ, आप मोटा गुडा के जवाई सा हुकम थें.

Tuesday, 23 October 2012

ठिकाना बीजापुर

ठिकाना बीजापुर - बीजापुर ठिकाना के तत्कालीन ठाकुर साहब श्री जोग सिंह जी विराजमान थे, उन के दो संताने हुई थी, एक बाईसा हुकम देवी कुंवर जी तथा भंवर श्री देवी सिंह जी, श्री देवी सिंह जी 

ठिकाना बीजापुर से प्रेम

ठिकाना बीजापुर में ठाकुर साहब श्री जोग सिंह जी के बाईसा देवी कुंवर का जब ठिकाना बुसी शादी हो रही थी तब बड़ी बारात आने के कारण अच्छी खातिरदारी के लिए मांस की आवश्यकता थी तब ,आप दाता हुकम के पास एक बकरा करीब १०० किलोग्राम का था. उस बकरे को माँगा तो दाता हुकम के दे दिया ,मांगे जाने का कारण था की छोटे छोटे बकरे बीजापुर ठिकाने में थे. इस बकरे के बदले चाहे जितने ले पधारे का कहा ,परन्तु दाता हुकम श्री भुर सिंह जी इंकार हो गये ,उन्होंने कहा दूर ही सही काका लगता हु ,मेरी भी जवाबदारी बनती है . उस बकरे की विशेषताएं थी की वह इनता भारी था की खड़ा भी नही हो सकता था .जिसको बैलगाड़ी ,[ जिस गाड़ी के पहिए लकड़ी के ही होते ] ,में बैठा कर लेकर पधारें थे . 

Sunday, 21 October 2012

ठाकुर श्री जुन्झार सिंह जी का परिवार

 ठाकुर श्री जुन्जार सिंह जी के चार संताने हूई , बड़े बाईसा द्रियाव कुंवर जी जिनको खांडी ठाकुर श्री रतन सिंह जी जोधा राजपूत से शादी कराई थी .दुसरे नम्बर बाईसा भिक कुंवर जी को ठिकाना सिणली समदडी [ जोधपुर ] में ठाकुर साहब जेलर सा श्री पाबू सिंह जी से करवाई थी ,जीनेके बड़े पुत्र आज पदेन सर्कल स्पेक्टर राजस्थान पुलिस ,थाना ऋषभदेव जिला - उदयपुर में तैनात है . तीसरे नम्बर संतान श्री ठाकुर स्वर्गीय डूंगर सिंह जी,.इन्होने ठिकाना पीलवा चम्पावत जी से शादी की थी , जिनके दो संताने हुई  . दितीय विश्व युद्ध में आप ने भाग लिया था तब सात वर्ष तक जर्मन ,फ़्रांस आदि जगह बिताये ,तब तक घर वालो को पत्ता ही नही था की वे जिन्दा है मुर्दा ,फिर सात साल बाद गाँव पधारे .बाद दूसरी नौकरी ट्रंक ड्राइवर के रूप में की .फिर  तीसरी अपनी नौकरी राजस्थान सरकार के सिचाई विभाग में ड्राइवर के रूप में की थी ,तत्कालीन उनके खलासी के रूप में जीवदा गाँव निकट सेणा के श्री मोपत सिंह जी थे जों आज वर्तमान में पाली जिला से जिला परिषद के मेम्बर पद से है .चौथे नम्बर पर ठाकुर भैरो सिंह जी ने शादी की औसिया भटियानी जी से की जिनके चार संताने हुई .

ठाकुर साहब श्री भुर सिंह जी के तीन संताने हुई थी .

 दाता हुकम ठाकुर श्री भुर सिंह जी ने दो शादिया की थी ,पहली शादी ठिकाना मुंडारा तहसील बाली जाती करनोत राजपूत और दूसरी शादी खुन्डाला उदावत राजपूत जिला -जोधपुर की थी ,उदावत जी से तीन संताने उत्पन्न हुई जिसमे एक  बेटा कुंवर श्री पदम सिंह जी , दो बाईसा राज एक ठिकाना -सांडन्द भनवारानी के पास  जिला -जालोर चंपावत राजपूत गांव ठाकुर साहब के पाटवी बेटे से हुई थी ,ये ठाकुर साहब तेज किस्म के थे इस लिए इनको एक दरोगा [ रावणा राजपूत जिसको कहते है ] दायजवाल मुकना [ मुकन सिंह ] दिया और एक धोड़ी आणा में थी . .इसके चार भाई थे १ स्वंय मुकना [ मुकन सिंह ] २  कस्तुरा [ कस्तूर सिंह ] ३  गनेशा [ गणेश सिंह ] ४  नारणा [ नारायण सिंह ] माता का नाम चंपा बाई , मुकना को आजादी दे दी गई जों आज फालना स्टेशन पर उसका वंश स्वतर्न्त्र रह रहा है . दाता हुकम ठाकुर साहब ने भी इन तीनो भाइयो को दासता से मुक्त किया ,जों छोटा गुडा जाकर बसे ,फिर वहा से पलायन होकर आज बीजापुर स्वतन्त्रता पूर्वक जी रहे है ,हाल कस्तूर बा की औरत तो और उसकी औलाद हमारी सेवाओं रही परन्तु आज उसके लडके ,शिक्षक ,फोज आदि ने नौकरीशुदा हो गये है ,नारायणा के तीन लडके हुए १ छतरा २ गमिया ३ जबरिया जों आज गुजरात में अपना कारोबार कर रहे है , .दुसरे बाई सा को दादाई ठिकाना मेडतिया राजपूत जिला -पाली में शादी कराई थी जों दादाई गाँव ठाकुर साहब के दुसरे बेटे कुंवर साहब थे .  इन दोनों का कन्यादान किया इस के बदले को कोई व्यवहार नही लिया था ..  

Friday, 19 October 2012

श्री सरदार सिंह का गोद जाना

बड़ा गुडा के ठाकुर श्री सरदार सिंह जी को नोक नाम का बेरा मिला था .इनके बड़े भाई गाँव ठाकुरश्री रणजीत सिंह जी थे, जिन्होंने शादी ठिकाना साली, चाणोद के पास की थी . जिनके ओलाद नही होने से अपने भाई सरदार सिंह जी गोद आये .फिर श्री रणजीत सिंह जी को ठिकाने से हाथ खर्ची में मोटा अट नामक बेरा दिया और उस मोटा बेरा [ अट ] श्री मती रणजीत सिंह के स्वर्गवास के बाद में श्री ठाकुर कमल सिंह जी ने अपने कब्जे लिया .   सरदार सिंह जी ने दो शादियां की थी पहली शादी मुंडारा करनोत राजपूत से की और दूसरी शादी कालीजाल से जोधा राजपूत से की जों जोधपुर में स्थित है . मुंडारा के भाणेज मोड़ सिंह जी जिनको दुसरे नाम अर्जुन सिंह जी से जाना जाता था.इन की शादी मालवा में पंवारो का ठिकाना रोसला की इन के थी ओलाद हुई [ १ ] सुआ कुंवर जीजा को  जिनको काकाणी शादी कराई जों इन से काकाणी ठाकूर साहब ने दूसरी शादी की थी  [ २ ] दुसरे नानका बाया को शादी बागावास बाड़मेर कराई ठाकुर किशोर करण जी से इन की भी दूसरी शादी थी   [ २ ] .कालीजाल के तीन भाणेज हुए [ १ ] रसालजी भुआसाइन की शादी सुन्देलाव ठिकाना में हुई  [ २ ] इंदर सिंह जी इन को बेरा कनविरी मिला और [ ३ ] जब्बर सिंह जी इनको बेरा वाडकी मिला भाई बंट में .   

ठिकाना मोटा गुडा & बड़ा गुडा

ठिकाना मोटा गुडा के श्री ठाकुर दाता हुकम भुर सिंह जी के भतिज जों गुडा गुमानसिंह के पाटवी ठाकुर सरदार सिंह जी थे, जों अपने भाइयो से भी हासल [ टेक्स , लेवी ] लेते थे ,जिसमे श्री ठाकुर भुर सिंह जी ने इसका विरोध के अपने कुए बादला बेरा के अलावा कोई खेत बुवाने से इंकार करके वो ठिकाना भागली जहाँ देवड़ा राजपूत रहते वहा अतिरिक्त खेती करवाते उसी दौरान गुडा गुमान सिंह की बजाय मोटा गुडा के नाम से नामांकरण किया क्योंकि गुडा देवी सिंह जी का गाँव भी पास भाईपा का होने से अपनी पहचान मोटा गुडा के नाम से रखी क्योकि ठाकुर भुर सिंह जी के पिता जी ने भी कभी भाइयो की गुलामी नही की वो भी मेवाड़ भानपुरा ही आना जाना लगा रहता था. उन का देहांत [ स्वर्गवास  ] भी भानपुरा हुआ था .और उनका अंतिम संस्कार मोटा गुडा में किया .बाकि भाइयो ने विरोध स्वरूप में गांव गुडा गुमान सिंह का ठिकाना बड़ा गुडा कर दिया जों सभी अतिरिक्त खेती का टेक्स दिया करते थे..इस कारण आज इस गुडा गुमान सिंह का नाम मोटा गुडा और बड़ा गुडा के नामों से जाना जाता है .शीत युद्ध के बावजूद काका भतिज शिकार में साथ साथ जाते ,कभी कभी तो सरदार सिंह जी शिकार में असफल होते तो दाता हुकम का इंतजार करते और फिर साथ साथ शिकार जाते .कभी कभी भूरा सूअर जिसकी साट खाने से जिनको दस्ते लगती जों कोई खां नही सकते वो ठाकुर श्री भुर सिंह जी पचा ,[ पचाना.,  हजम ] कर लेते  ..